Saturday, 30 June 2012

सेवा कर : मंहगाई की एक और सौगात

लोगों की खाल खींचने में कोई कोताही नहीं कर रही सरकार

मंहगाई से त्राहि त्राही कर रही जनता पर अभी मंहगाई की मार कहां पड़ी है, वित्त मंत्रालय से जाते जाते आम आदमी की ऐसी तैसी करने में प्रणव दादा का जहरीले बजट  कम नही था. अब भी लोगों की खाल खींचने में कोई कोताही नहीं कर रही सरकार.
बहरहाल महंगाई की असली चुभन अब महसूस होगी. पहली जुलाई रविवार से कोचिंग क्लासेस व प्रशिक्षण केंद्र से लेकर होटल में खाने-पीने और हवाई यात्रा तक सभी पर महंगाई टूट पड़ेगी. फिलहाल, रेल माल ढुलाई व यात्री किराए में रविवार से सेवाकर लगने को लेकर भ्रम की स्थिति बनी हुई है. रेलमंत्री मुकुल राय ने कहा है कि रेलवे एक जुलाई से माल भाड़ा और यात्री किराए पर सेवाकर नहीं लगाएगा. इस बाबत उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को पत्र लिखा है, जिनके हाथों में ही इस समय वित्त मंत्रालय की कमान भी है. नई सेवा कर व्यवस्था के लागू होने के साथ ही आज  यानी एक जुलाई से कई सेवाएं महंगी हो जाएंगी और लोगों को इनके लिए 12 प्रतिशत की दर से सेवा कर चुकाना पड़ेगा.
हालांकि नकारात्मक सूची में शामिल 38 सेवाओं पर नई व्यवस्था का असर नहीं होगा. यह सूची भी एक जुलाई से ही प्रभावी मानी जाएगी. इस सूची में शामिल सेवाओं के अलावा अंतिम संस्कार से जुडी सेवाएं भी इसके दायरे में नहीं आएंगी. दूसरी ओर जिन सेवाओं को नई व्यवस्था के दायरे में लाया गया है उनमें कोचिंग और प्रशिक्षण संस्थान शामिल हैं. हालांकि स्कूलों, विश्वविद्यालय स्तर की शिक्षा तथा व्यावसायिक शिक्षा को इससे छूट दी गई है.
नई कर व्यवस्था की सबसे बडी़ खामी यह है कि इसमें रेल माल ढुलाई तथा रेल यात्री किरायों पर सेवा कर को लेकर असमंजस की स्थिति बनी हुई है. अभी तक ऐसी सेवाओं की कुल संख्या 119 है. इसके साथ ही एक नकारात्मक सूची भी तैयार की गई है, जिसमें वर्णित सेवाओं को सेवा कर के दायरे से बाहर रखा गया है. सेवाकर के दायरें को बढा़ने के पीछे सरकारी मंशा वस्तु एंव सेवा कर (जीएसटी) को लागू करने की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ना है. सरकार ने इस साल के बजट में सेवाकर का दायरा बढ़ाते हुए सेवाकर की परिभाषा को व्यापक बनाया है. अब तक 119 सेवाएं ‘सकारात्मक सूची’ में शामिल थी और उन्हीं पर सेवाकर लगाया जाता रहा. सेवाकर के दायरे को व्यापक बनाने का सरकार का नया कदम वस्तु एवं सेवाकर (जीएसटी) की दिशा में एक कदम और आगे बढ़ने के तौर पर देखा जा रहा है.
सरकार व स्थानीय प्राधिकरणों को एयरक्राफ्ट की मरम्मत और रखरखाव के लिए दी जाने वाली सेवाओं को भी नकारात्मक सूची में रखा गया है. इसी तरह वकीलों द्वारा दूसरे वकीलों और दस लाख रुपये तक का टर्नओवर रखने वाले व्यावसायिक संस्थानों को भी सेवाकर के दायरे से मुक्त रखा गया है. सार्वजनिक शौचालय भी इसके दायरे में नहीं रहेंगे. जवाहरलाल नेहरू राष्ट्रीय नवीकरण मिशन [जेएनएनयूआरएम] व राजीव आवास योजना जैसी स्कीमों को भी नकारात्मक सूची में रखा गया है. वित्त मंत्रालय ने चालू वित्त वर्ष में सेवाकर से 1.24 लाख करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है.

Wednesday, 27 June 2012

क्रूर पाकिस्तानी मजाक

पाकिस्तान की सरकार ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि वह विश्वास के योग्य नहीं है. कट्टरपंथियों, सेना और आतंकवादी गिरोहों के साथ-साथ अपनी कुख्यात गुप्तचर एजेंसी आईएसआई के गिरफ्त में वहां की सरकार भारत के लिए ही नहीं, पूरी दुनिया के लिए भी भरोसेमंद नहीं रही है. मौत की सजा का सामना कर रहे एक भारतीय कैदी की रिहाई की पाकिस्तान सरकार की घोषणा के कुछ घंटों बाद ही पहली घोषणा को पलटकर एक अन्य भारतीय कैदी की रिहाई की बात करना उसके लिए अंतरराष्ट्रीय शर्मिदगी जैसी बात है, लेकिन शायद उसके लिए इससे कोई फर्क नहीं पड़ता. रक्षा विशेषज्ञों का अनुमान गलत नहीं है. उनका मानना है कि यह
पाकिस्तान में 1990 में बम विस्फोट की कई घटनाओं में संलिप्तता को लेकर जबरन दोषी ठहराए गए और मौत की सजा का सामना कर सरबजीत सिंह को कल ही पाकिस्तान सरकार द्वारा रिहा करने की खबर आने के कुछ ही घंटे बाद राष्ट्रपति के प्रवक्ता फरहतुल्ला बाबर ने बताया कि अधिकारी सुरजीत सिंह नाम के एक अन्य भारतीय कैदी को रिहा करने के लिए कदम उठा रहे हैं, जो जासूसी के मामले में जेल में बंद था.
पाकिस्तान का यह
सरबजीत सिंह की रिहाई पर सरकार का रुख पलटने के एक दिन बाद आज पाकिस्तान ने सफाई पेश करते हुए कहा कि उन्हें रिहा करने की कोई योजना नहीं थी और इस मुद्दे पर सेना के किसी भी दबाव से इनकार किया.
पाकिस्तान के गृह मंत्री रहमान मलिक ने संवाददाता सम्मेलन में यह पूछे जाने पर कि क्या सरबजीत को रिहा करने की योजना सेना के दबाव में टाली गई, कहा कि इस मुद्दे पर सरकार में कोई चर्चा भी नहीं की गई. मलिक ने कहा,
गौरतलब है कि कल सरबजीत सिंह को रिहा किए जाने की खबरों के कुछ ही घंटे बाद पाकिस्तान ने सफाई दी कि उसने एक अन्य भारतीय कैदी सुरजीत सिंह को रिहा करने के कदम उठाए हैं, जो तीन दशक से जेल में बंद है.
पाकिस्तानी मीडिया ने कल खबरें जारी की थीं कि राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने सरबजीत की मौत की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर दिया है और सजा पूरी होने की स्थिति में उसे रिहा करने का आदेश दिया है, लेकिन बाद में मीडिया ने सरकार द्वारा कल मध्य रात्रि के बाद जारी किए गए स्पष्टीकरण को
घालमेलजानबूझकर हो सकता है. भारत में 26/11 के मुंबई हमले के प्रमुख अभियुक्तों में एक अबु जंदाल की गिरफ्तारी से पाकी सेना और आईएसआई सकते में हैं. माना जा रहा है कि दबाव बढ़ाने के लिए उन्होंने रिहाई रुकवाई होगी. यू टर्नसरबजीत और उसके परिजनों के साथ नहीं भारत के साथ भी यह एक क्रूर मजाकहै. हालांकि उसकी जगह छूटने वाला दूसरा कैदी पंजाब का फरीदकोट निवासी सुरजीत सिंह भी भारतीय है और वह भी पिछले 31 सालों से पाकिस्तानी कैद में झूठे आरोप में बंद है. सुरजीत को पूर्व सैन्य शासक जिया-उल-हक के कार्यकाल के दौरान जासूसी के आरोप में गिरफ्तार किया गया था. उसकी मौत की सजा तत्कालीन राष्ट्रपति गुलाम इश्हाक खान ने 1989 में आजीवन कारावास में तब्दील कर दी थी और उसने भी अपने कारावास की सजा पूरी कर ली है. उसे हर हाल में पाकिस्तान को छोड़ना ही था. लेकिन अपने आतंकवादी गिरोह के अबु जंदाल के भारत की गिरफ्त में आ जाने की खबर से पाकिस्तानी सेना और आईएसआई को सांप सूंघ गया और सौदेबाजी के लिए ही वहां की सरकार ने सरबजीत को रिहा करने की अपनी नीयत बदल ली.हमने तो अभी सरबजीत को माफी भी नहीं दी है-हर बात में सेना को न घसीटें. सेना की भूमिका बहुत महत्वपूर्ण है और बनी रहेगी. सेना ने कभी हस्तक्षेप नहीं किया. वह कभी रिहा नहीं किए गए.उन्होंने यह भी कहा कि सरकार ने अभी सरबजीत की माफी पर कोई कदम नहीं उठाया है.यू-टर्नकी संज्ञा दी.

Sunday, 24 June 2012

मगरमच्छों, कछुओं की तरह अंडे देते थे डायनासोर

इंदौर : मध्यप्रदेश की नर्मदा घाटी में बिखरे जुरासिक खजानेको ढूंढ़ निकालने वाले एक खोजकर्ता समूह ने दावा किया है कि मगरमच्छों और कछुओं के अंडे देने का तरीका सरीसृप वर्ग के अपने पुरखोंयानी डायनासोरों से काफी हद तक मेल खाता है. मंगल पंचायतन परिषदके प्रमुख विशाल वर्मा ने आज कहा, नर्मदा घाटी में आज से कम से कम साढ़े छह करोड़ साल पहले पाए जाने वाले डायनासोर सरीसृप वर्ग के ठंडे रक्त वाले जीव थे. ये विशाल जानवर मगरमच्छ और कछुए जैसे सरीसृपों की तरह ही अंडे दिया करते थे.उन्होंने कहा कि जिस तरह मगरमच्छ और कछुए अपने जलीय आवासों से निकलकर जलाशयों और समुद्र के रेतीले किनारों पर अंडे देते हैं, उसी तरह डायनासोर भी अपनी रिहाइश की थलीय जगहों से अलग ऐसे ही तटों पर अंडे देने पहुंचते थे.
वर्मा ने कहा,
वर्मा ने बताया कि अंडे देते वक्त डायनासोर ऐसी जगह चुनते थे, जो परभक्षियों की पहुंच से दूर और मौसम की उथल-पुथल से महफूज होती थी.
डायनासोरों की कई प्रजातियों की मादाएं नदियों और सरोवरों के रेतीले तटों पर अंडे देने के लिए लंबी यात्रएं भी करती थीं.उन्होंने बताया कि डायनासोर आम तौर पर किसी बड़े जलाशय या नदी के किनारे रेतीली और रवेदार मिट्टी में अंडे देते थे. अंडा देने की जगह डायनासोर और उनके समूह के आकार के मुताबिक विस्तृत होती थी.
वर्मा के मुताबिक उन्हें इन घोंसलों में डायनासोर के सौ से ज्यादा अंडों के जीवाश्म मिले थे. इनमें सबसे दुर्लभ घोंसला वह है, जिसमें इस विलुप्त जीव के करीब 15 अंडों के जीवाश्म एक साथ मिले थे.
उन्होंने बताया कि वह अब तक डायनासोर के 150 से ज्यादा अंडांे के जीवाश्म ढूंढ़ चुके हैं. बहरहाल, आज यह यकीन करना बेहद मुश्किल है कि वर्तमान नर्मदा घाटी में कभी डायनासोर की सल्तनत थी.
उन्होंने बताया कि नर्मदा घाटी में इस विलुप्त प्राणी के जो जीवाश्मीकृत अंडे अब तक मिले हैं, उनमें से करीब 90 प्रतिशत अंडे सौरोपॉड परिवार के डायनासोराें के हैं.
वह बताते हैं कि इस परिवार के डायनासोर शाकाहारी थे और उनकी ऊंचाई 20 से 30 फुट होती थी. ये डायनासोर तत्कालीन रेतीले इलाकों में दूरस्थ इलाकों से अंडे देने आते थे.
वर्मा ने कहा,
वर्मा के मुताबिक भारतीय डायनासोर के जीवाश्मीकृत अंडे और घोंसले मिलने का क्षेत्र करीब 10,000 वर्ग किलोमीटर में फैला है. इन अंडों की आयु 6. 5 करोड़ वर्ष से 6- 8 करोड़ वर्ष आंकी गई है.
उन्होंने बताया कि डायनासोर के जीवाश्मीकृत अंडे और घोंसले खासकर उन जगहों पर पाए गए हैं, जहां सहस्त्रब्दियों पहले ज्वालामुखी विस्फोट हुआ करते थे.
मंगल पंचायतन परिषदने तब पहली बार दुनिया भर का ध्यान खींचा था, जब इस खोजकर्ता समूह ने वर्ष 2007 के दौरान नजदीकी धार जिले में डायनासोर के करीब 25 घोंसलों के रूप में बेशकीमती जुरासिक खजाने की चाबी ढूंढ़ निकाली थी.हमारे पास इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि चट्टानों की जिन परतों में डायनासोर के अंडों के जीवाश्म दबे मिले हैं, वे बार-बार बाढ़ से प्रभावित होती रही हैं. इन जीवाश्मीकृत अंडों के आस-पास छोटे एवं गोल पत्थरों और बजरी का मिलना यह साबित करता है कि डायनासोर के घांेसलों के पास बाढ़ का पानी घुस आया करता था.उन्होंने बताया कि डायनोसोर के अंडे, मिट्टी और गाद से ढंके होने के कारण शिकारियों एवं दूसरे दुश्मनों से छिपे रहते थे और इन पर बैक्टीरिया का भी असर नहीं हो पाता था.

कबीर-नानक की मिलनस्थली पर बन रहा दुनिया का अजूबा


अमरकंटक : अमरकंटक घने जंगलों, नदियों, मंदिरों और गुफाओं का पर्याय एक रमणीक स्थल मात्र नहीं, बल्कि अध्यात्म व साहित्य साधना की मिलनस्थली भी है, जहां कबीर व गुरु नानक के बीच संवाद हुआ. जहां घने जंगलों के दरख्तों से गिरे सूखे पत्ताें की खड़खड़ तथा नर्मदा, सोन नदी के उद्गम से निकलने वाले पानी की कलकल ध्वनि में आध्यात्मिक संगीत के सुर सुने जा सकते हैं. जहां घने जंगलों में हठयोगी बाहरी दुनिया से बेखबर जहां-तहां धूनी रमाए देखे जा सकते हैं. इसी पवित्र नगरी में दुनिया के एक अनूठे मंदिर का निर्माण हो रहा है.
जैन तपस्वी संत आचार्य विद्यासागर की प्रेरणा से अमरकंटक में अष्टधातु की दुनिया की सबसे बड़ी मूर्ति प्रतिष्ठित की जा रही है.
दुनिया में अपनी तरह की अनूठी तथा एक रिकार्ड कायम करने वाली मूर्ति के भव्य मंदिर का निर्माण इस समय जोर-शोर से चल रहा है. लगभग दस फुट ऊंची प्रथम जैन र्तीथकर भगवान आदिनाथ की यह मूर्ति 28,000 किलोग्राम वजनी है तथा इसे अष्टधातु के ही 24000 किलोग्राम वजनी कमल सिंहासन पर प्रतिष्ठित किया गया है. मंदिर को गुजरात के मशहूर अक्षरधाम मंदिर की स्थापत्य शैली के अनुरूप बनाया जा रहा है और इसके स्थापत्य की विशेषता है कि इसे बिना इस्पात तथा सीमेंट के बनाया जा रहा है, ताकि वक्त की थपेड़ें इसका क्षय नहीं कर सकें और यह सदियों तक अक्षय बना रहे. इस विशाल मंदिर की ऊंचाई 144 फुट, लंबाई 424 फुट तथा चौड़ाई का दायरा 111 फुट है
न्यासी प्रमोद जैन के अनुसार इस मंदिर के निर्माण पर लगभग 25-30 करोड़ रुपया व्यय होगा तथा संभवत: अगले वर्ष के मध्य तक (2013) इसकी प्राण प्रतिष्ठा हो जाएगी. ऐसी संभावना है कि प्राण प्रतिष्ठा समारोह आचार्य श्री और उनके संघ के सानिध्य में होगा.
एक जैन श्रद्धालु के अनुसार मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ के संधिस्थल पर बसे इस क्षेत्र में विहार करते वक्त आचार्य भी यहां र्जे-र्जे में बसी आध्यात्मिकता से इतना प्रभावित हुए कि उन्होंने यहां मंदिर बनवाने का निश्चय कर लिया और अब दुनिया का एक अनूठा आध्यात्मिक व धार्मिक केंद्र यहां निर्मित हो रहा है और घने जंगलों में मंदिर के घंटों के स्वर यहां के अद्भुत माहौल को और भी अद्भुत बना देंगे.
गहराती शाम में निर्माणाधीन मंदिर से कुछ दूरी पर घने जंगलों में कबीर चबूतरे पर धूनी जमाए साधुओं द्वारा गाए जा रहे कबीर के भजन माहौल को और भी विस्मयकारी कर देते हैं. कबीर चौरा, चबूतरों पर कबीर व गुरुनानक के चित्र शायद उसी संवाद को जीते से लगते हैं.

Saturday, 23 June 2012

धर्म का बढ़ता व्यापार

धर्म का व्यापार अथवा धर्म के नाम पर व्यापार कोई नई बात नहीं है. संचार माध्यमों और मीडिया प्रसारण के इस युग में धर्म को माध्यम बना कर ऐसे पाखंड प्रचारित किए जा रहे हैं कि भविष्य के प्रति आशंकित लोगों को अपने भविष्य सुधारने के लिए इन जालों में फंसते देर नहीं लगती.
धर्म का गुण है अनेक को अपनी छत्रछाया में लेना और सबको विकास की राह दिखाना. लेकिन धर्म के नाम पर आज हमें जो प्रयास नजर आते हैं, उनमें विभिन्न समुदाय-वर्गो को सामाजिक सरोकारों से जुड़ने की प्रेरणा देने के बजाय अपने व्यावसायिक हितों को साधने का साधन बनाने की कोशिशें ही कोशिशें दीख पड़ती हैं. ऐसे लोगों ने धर्म को व्यापार बना दिया है, वे भगवान को अपनी जेब में रखना चाहते हैं और अवसर मिलते ही उसे भुनाना भी चाहते हैं.
ऐसी चाहत आज बढ़ती ही जा रही है. यह धन कमाने का सर्वाधिक सरल और सुगम मार्ग बन गया है. इस सरलता और सुगमता का माध्यम लोगों की अंधी आस्था और आसानी से जीवन में सबकुछ हासिल कर लेने की लालच है.
टीवी चैनलों पर ऐसे दैवीय यंत्रों की भरमार दिखाई पड़ती है जो यह दावा करते हैं कि उनके उपयोग से जिंदगी में खुशहाली आ जाएगी. इनकी श्रेष्ठता और सत्यता साबित करने के लिए फिल्म और टेलीविजन के सितारों की भी मदद ली जाने लगी है. पिछले कुछ सालों में, कुछ हिंदी टेलीविजन चैनलों ने कुछ पाखंडी धर्म गुरुओं के गोरखधंधों का पर्दाफाश करने का दावा किया है, जबकि उनका यह प्रयास संदेह के घेरे से बाहर नहीं है.
अधिकांश मामलों में इन धर्म गुरुओं के बारे में यह आरोप लगाए गए हैं कि इन लोगों ने व्यक्तिगत लाभ और पैसा कमाने के लिए लोगों की धार्मिक भावनाओं से खिलवाड़ किया है. आर्थिक दोहन, यौन शोषण, संकुचित सोच और अंधविश्वास ने हर तरह के अपराधों को बढ़ावा दिया है फिर वह व्यक्तिगत हिंसाचार हो या फिर सामूहिक हत्या या आतंकवाद. इनकी पुनरावृत्ति पूरे देश में और हर धर्म में होती दिखाई पड़ती है. नि:संदेह, धर्म के मामले में यह पूरी तस्वीर नहीं है, लेकिन फिर भी हमारा ध्यान आकर्षित करने के लिए इसमें पर्याप्त महत्वपूर्ण पहलू तो हैं ही.
पूरे विश्व में, व्यक्तियों में धर्म की श्रेष्ठता के प्रति आस्था और उसका व्यक्तिगत जीवन पर असर बढ़ने के बजाय धार्मिक प्रथा-परंपराओं के स्वरूप में बदलाव आता जा रहा है. भारत में, आर्थिक सुधारों और उससे उत्पन्न हुई संपन्नता ने धार्मिक भावनाओं को कमजोर करने के बजाय और प्रबल किया है. उसके प्रमाण हमारे चारों ओर पसरे हुए हैं.
विभिन्न टेलीविजन चैनल गुरुओं को ब्रांडबनाने में लगे हुए हैं. धार्मिक उत्सवों को प्रमुखता से दिखाया जा रहा है. हमारे रोजमर्रा के जीवन में भी धार्मिक अनुष्ठानों का बड़ा महत्व नजर आने लगा है. मंदिरों में खूब भीड़भाड़ नजर आती है, खासतौर पर परीक्षा के दिनों में.
बात केवल ईश्वर से अपने सुख और कल्याण के लिए व्यक्तिगत प्रार्थना तक सीमित नहीं रह गई, बल्कि अब तो ऐसी कई कहानियां सुनने को मिल जाती हैं, जिनमें ईश्वर के प्रकोप से बचने और वरदान पाने के लिए कुछ भक्त विचित्र प्रायश्चित करते हैं. इनकी वजह से मनुष्य मात्र का नुकसान भी होता है.
प्रार्थना एक ऐसा अस्त्र माना जाता है जो असंभव को संभव कर सकता है. मानव मात्र अपने साथ घटने वाली अनपेक्षित, बुरी घटनाओं से इसी प्रार्थना के सहारे बचना चाहता है. प्रार्थना में ईश्वर से फरियाद के साथ-साथ बाध्यकारी मांग भी शामिल होती है. इसमें दासता का भाव भी निहित होता है और भावनाओं का अतिरेक भी.
परंपरागत तौर पर प्रार्थना या ईश्वर की आराधना में अपेक्षा की जाती है कि बिना किसी उम्मीद, सवाल-जवाब ऊपर वाले के समक्ष समर्पण. लेकिन अब लगातार इस बात को अनुभव किया जा रहा है कि भक्तों की मांगों ने आत्मसमर्पण को पिछवाड़े छोड़ दिया है. प्रार्थना, परिणाम पर निर्भर हो गई है.
तथाकथित धार्मिकता और असल धार्मिकता के बीच खाई बढ़ रही है. परिणामस्वरूप धर्म की सामाजिक उपयोगिता का ह्रास हो रहा है. धर्म, व्यक्तिगत विकास का माध्यम बनने के बजाय एक रिमोट कंट्रोल बन रहा है जिसे जो, जब, जहां चाहे अपने स्वार्थ के लिए घुमा लेता है.
जहां सच्ची धार्मिकता आत्मसुधार और बिना शर्त समर्पण के भाव पैदा करता है, वहीं आज धर्म से लोगों का रिश्ता अधिकाधिक मांगों भरा हो गया है, जिसमें स्वार्थ ही स्वार्थ है, समर्पण अथवा अर्पण का कहीं नामो निशान भी नजर नहीं आता.

Sunday, 17 June 2012

नई भूमिका में प्रणब मुखर्जी

नई भूमिका में प्रणब मुखर्जी
चैन की सांस ले रहे उद्योग जगत एवं..

वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाए जाने से उद्योग जगत चैन की सांस लेता नजर आ रहा है. विलक्षण प्रतिभा, अद्वितीय स्मरण शक्ति और उत्कृष्ट कांग्रेसी के रूप में मशहूर श्री मुखर्जी संप्रग सरकार के संकटमोचक माने जाते रहे हैं. वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी के समय देश की अर्थव्यवस्था को संभालने में बेहतर भूमिका निभाने वाले श्री मुखर्जी की दुनिया भर में प्रशंसा हो चुकी है. लेकिन आश्चर्य है कि न केवल उद्योग जगत ऐसे संतोष जता रहा है, मानो वित्त मंत्रलय को मुक्तिमिल रही हो, बल्कि कांग्रेस का एक वर्ग भी पार्टी को उनसे मिल रही मुक्ति से खुश है. पार्टी में ही नहीं अन्य दलों में भी प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे सुयोग्य समङो जाने वाले श्री मुखर्जी के साथ विडंबना है कि कोई उन्हें इस पद पर देखना नहीं चाहता था. यहां तक कि कांग्रेस अध्यक्ष श्रीमती सोनिया गांधी और उनके राजनीतिक सलाहकार भी इस पक्ष में कभी नहीं रहे कि उन्हें देश का प्रधानमंत्री बनाया जाए. अपनी इस महत्वाकांक्षा के कारण तो उन्हें कांग्रेस छोड़ने पर भी बाध्य होना पड़ा था.

इधर अब तो देश की अर्थव्यवस्था में आ रही गिरावट के लिए प्रधानमंत्री के नजदीकी सूत्र समेत सरकार के कुछ मंत्री भी श्री मुखर्जी को ही जिम्मेदार मानने का संकेत देने लगे थे. जून के प्रथम सप्ताह में देश के विभिन्न समाचारपत्रों में छपे देश के मूर्धन्य पत्रकार कुलदीप नैयर भी अपने स्तंभ (कॉलम) में बताने से नहीं चूके कि पिछले वार्षिक बजट में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के सुझाव तक को श्री मुखर्जी ने ठुकरा दिया था. यह भी संकेत दिए जाने लगे थे कि आर्थिक और वित्तीय मामलों में ही नहीं, अन्य मामलों में भी श्री मुखर्जी अन्य मंत्रियों की तरह प्रधानमंत्री के सुझावों को नजरंदाज करने से नहीं चूकते थे. उनका यह रुतबा पार्टी और सरकार दोनों के लिए बहुत ही भारी पड़ने लगा था. सूत्र बताते हैं कि राष्ट्रपति पद के लिए पार्टी के पास दूसरा कोई विकल्प न होने के कारण श्री मुखर्जी को रायसीना हिल्स का रास्ता दिखा कर पार्टी और सरकार दोनों ने अपना उद्धार करने की कोशिश की है.
कांग्रेस पार्टी और सरकार के लिए अपरिहार्य बन चुके श्री मुखर्जी के रुतबे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि विभिन्न नीतिगत एवं प्रशासनिक विषयों पर विचार के लिए सरकार की ओर से गठित 37 मंत्रियों के समूह (जीओएम) में 24 की अध्यक्षता प्रणब ही कर रहे थे.
इधर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह द्वारा वित्त मंत्रलय का कार्यभार अपने हाथों में लेने की चर्चा के बीच उद्योग जगत में भी नई उम्मीदें जगी हैं. कारोबारी जगत यह भी मानता है कि यदि प्रधानमंत्री स्वयं वित्त मंत्रलय को अपने हाथ में रखते हैं तो बाजार में इससे विश्वास बढ़ेगा. उनकी राय है कि फिलहाल देश में बहुब्रांड खुदरा कारोबार, बीमा क्षेत्र में सुधारों को मजबूती से आगे बढ़ाने और नए कंपनी विधेयक और वस्तु एवं सेवाकर यानी जीएसटी को भी जल्द से जल्द अमल में लाने की जरूरत है.
वे इस बात से चिंतित हैं कि अर्थव्यवस्था की सुस्ती, औद्योगिक उत्पादन में ठहराव, निर्यात के मोर्चे पर घटती वृद्धि, हिचकोले खाते शेयर बाजार और गिरते रुपए के साथ साथ जिद्दी महंगाई जैसी तमाम चुनौतियां देश के सामने हैं. भारतीय अर्थव्यवस्था की जीडीपी वृद्धि दर मार्च, 2012 को समाप्त हुई तिमाही में घटकर 5.3 प्रतिशत पर आ गई, जो बीते साल की इसी अवधि में 9.2 प्रतिशत थी. वर्तमान में यूरोक्षेत्र के संकट से दुनिया एक बार फिर मंदी का सामना कर रही है और भारत पर भी इसका असर दिखना शुरू हो गया है.
देश के शीर्ष वाणिज्य एवं उद्योग संगठनों में वाणिज्य एवं उद्योग मंडल
एसोचैमके महासचिव डी.एस. रावत के अनुसार, नए वित्त मंत्री के समक्ष कठिन चुनौतियां हैं, यूरोक्षेत्र सहित विभिन्न वैश्विक घटनाक्रमों का भारत पर असर नहीं पड़े, नए वित्त मंत्री को यह देखना होगा.शेयर बाजार विशेषज्ञ और दिल्ली शेयर बाजार के पूर्व अध्यक्ष अशोक अग्रवाल के अनुसार, प्रधानमंत्री खुद वित्त मंत्रलय का कार्यभार संभालें, इसको लेकर बाजार में सकारात्मक सोच है.पीएचडी वाणिज्य एवं उद्योग मंडल के अर्थशास्त्री एस.पी. शर्मा का मत है कि फिलहाल देश की अर्थव्यवस्था को उबारने की जरूरत है. उनके अनुसार, अर्थव्यवस्था में देशी-विदेशी निवेशकों के विश्वास को फिर से कायम करने की जरूरत है. निवेशकों का यह विश्वास आज बिल्कुल निचले स्तर पर पहुंच गया है.भारतीय कंपनी सचिव संस्थान (आईसीएसआई) के अध्यक्ष निसार अहमद ने कहा कि अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए इस समय दूसरी पीढ़ी के सुधारों को आगे बढ़ाने की नितांत आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि सरकार को महत्वपूर्ण सुधारों से जुड़े कम से कम चार-पांच मुद्दों पर सभी दलों को विश्वास में लेकर आम सहमति बनाकर सुधारों को आगे बढ़ाना चाहिए. इससे पूरी दुनिया में निवेशकों के बीच सकारात्मक संकेत जाएगा.
नए वित्त मंत्री के बारे में अहमद का स्पष्ट मत है कि मौजूदा परिस्थितियों में वित्त मंत्री का पद काफी अहम् हो गया है. प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह यदि खुद वित्त मंत्रलय का कामकाज देखते हैं तो इससे काफी मदद मिल सकती है. देश में आर्थिक सुधारों की शुरुआत भी उन्होंने ही की थी.
वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी को सभी काफी सुलझा व्यक्ति भी मानते हैं. वे यह भी मानते हैं कि वर्ष 2008 की वैश्विक मंदी के समय मुखर्जी ने देश की अर्थव्यवस्था को संभालने में बेहतर भूमिका निभाई. वे इस बात को भूले नहीं हैं कि मुखर्जी ने उस समय घरेलू उद्योगों को उत्पाद एवं अन्य करों में छूट देकर राहत पैकेज दिया था.
अब देखना है राष्ट्रपति भवन में सक्रिय राजनीति से दूर रह कर श्री मुखर्जी की भूमिका कितनी सार्थक हो सकती है.
कल्याण कुमार सिन्हा

Saturday, 16 June 2012

तालीम बनी तिजारत
डोनेशन नहीं तो एडमिशन नहीं
पवित्र कुरआन में अल्लाह ने सबसे पहले जो हुक्म तमाम इन्सानों को दिया वो हुक्म है पढ़यानी तालीम हासिल कर, अल्लाह ने तमाम कामों का हुक्म बाद में दिया. रोज़ा, नमाज़, हज़ और जकात सारे हुक्म बाद में आए, लेकिन सब से पहले इल्म हासिल करने का हुक्म आया, क्योंकि जब तक इन्सान इल्म हासिल नहीं करेगा वो खुदा को भी नहीं पहचान सकता. उसकी कुदरत और ताकत को नहीं समझ सकता. इल्म हासिल करेगा तो खुदा की सारी खुदाई, उसके सारे निज़ाम को समङोगा. अच्छे और बुरे की तमीज़ होगी. हलाल और हराम पहचानेगा, जिंदगी गुजारने का ढंग आएगा. इसीलिए हज़रत मोहम्मद (स) ने फरमाया कि इल्म हासिल करना फर्ज है और इसी इल्म की दौलत से वे इलाके जो बहुत जाहिल, ज़ालिम, कत्ल व खून जिनकी रगों में शामिल था. दुनिया के तमाम इन्सानों के रहबर बन गये.
अरब और यूनान इल्म का गढ़ बन गए. जहालत खत्म हो गई. पूरा अरब ऐसा तरक्की कर गया कि दुनिया उनके कदमों में आ गई.. और ये सच है कि तालीम के बगैर कोई इनसान, कोई समाज, कोई इलाका और कोई भी मुल्क तरक्की नहीं कर सकता, मगर अफसोस कि जब तालीम की अहमियत हर गरीब, फकीर, देहाती के भी समझ में आ गई, गांव-खेड़े के लोग भी इल्म हासिल करने के लिए शहरों की तरफ आने लगे, मज़दूर और हमाल भी अपने बच्चों को पढ़ाने के ख्वाब देखने लगे तो शिक्षण माफिया, एजूकेशन माफिया ने ऐसा जुल्म ढाया, डोनेशन की ऐसी गोलियां और बारूद ईजाद किए कि गरीबों के सारे ख्वाब टूट गए, वो इल्म जो अंधों को आंखें और गूंगों को ज़बान दे देता है. इल्म जो दरिंदे को इन्सान, फकीर को अमीर, जाहिल को आलिम बना देता है, जिससे दुखों और मुसीबतों के बादल छंट जाते हैं, बरकत और रहमत की बारिशें बरसती हैं. अब इस इल्म पर सिर्फ अमीरों और मालदारों का कब्जा होने लगा, क्योंकि डोनेशन नहीं तो एडमिशन नहीं.
रिश्वत ने बड़े खूबसूरत अंदाज में डोनेशन का नाम ले लिया. बिल्डिंग फंड के नाम पर वो जायज़ हो गया. अब कोई भंगार जमा करने वाला बाप, कचरा चुनने वाली मां और रिक्शा चलाने वाला भाई, दूसरों के घर बरतन मांजने वाली बहन अगर अच्छी और ऊंची तालीम अपने बच्चों को, छोटों को दिलाना चाहते हैं तो नर्सरी के लिए 50 हजार, बहुत ही छोटा और नया स्कूल है तो पांच हजार, उर्दू इदारा है तो तीन हजार, वो कहां से लाएंगे. गरीब को मैनेजमेंट के किसी जिम्मेदार का सिफारिशी लेटर भी नहीं मिलता. मैनेजमेंट के कोटे में उनके आगे-पीछे घूमने वाले, उनकी हां में हां मिलाने वाले, उनके सियासी मफाद के लिये काम करने वाले, उनकी गाड़ियों का दरवाजा खोल कर उनका इस्तकबाल करने वाले, उनके खबरी या ऐसे मालदारों को जो पचासों गरीबों की फीस भर सकते हैं, उन्हें डोनेशन माफी का लेटर मिलता है.
ये तमाम क्वालिटी आप में है तो आपका एडमिशन बिना डोनेशन के हो सकता है, वरना गरीब का एडमिशन कहीं नहीं, अगर गरीब का बच्चा बड़ी मुसीबतों और हालात से गुजरते हुए दसवीं या बारहवीं पास कर लेता है तो फिर डोनेशन का बम उसकी ज़िंदगी को तबाह कर देता है.
डीएड 1 लाख, बीएड तकरीबन दो लाख, बीयूएमएस डोनेशन छह लाख, एमबीबीएस, बीडीएस सिर्फ डोनेशन 40-50 लाख.. अब ऐसी महंगी तालीम गरीब कहां हासिल कर सकता है, यानी गरीबी तम्हारा जुर्म है. तुम डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस/आईपीएस, एसपी और कलेक्टर नहीं बन सकते. तालीम को तिजारत (बिजनेस) बना लिया. अब सबसे अच्छी तिजारत, अच्छा बिजनेस यही है कि स्कूल या कॉलेज खोल लो. फकीर मालदार बन गये, लुटेरे इज्जतदार बन गये, मगर याद रखो तालीम को इन्सानों के लिए मुश्किल और तिजारत बनाओगे तो खुदा से भी दुश्मनी मोल लोगे और खुदा तुम्हारी ज़िन्दगियों का सुकून छीन लेगा.
आज हम अपनी आंखों से देख रहे हैं कि जिस मैनेजमेंट में डोनेशन खूब आ रहा है. वहां आपस की बांटा-बांटी में कोर्ट-कचहरी, यहां तक कि लड़ाई-झगड़े, कत्ल व खून तक पहुंच रहे हैं. अफसोस तो ये है कि सरकार की तरफ से सभी कॉलेज मैनेजमेंट को चेतावनी दी जाती है कि सिर्फ मेरिट की बुनियाद पर ही एडमिशन लें, अगर डोनेशन लेकर दाखिला दिया तो सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी, मगर इसका असर किसी कॉलेज या मैनेजमेंट पर नहीं पड़ता. वो बड़ी ही डेयरिंग के साथ डोनेशन लेते हैं और अच्छे, ज़हीन मगर गरीब बच्चों को बाहर कर दिया जाता है. डोनेशन लाखों और करोड़ों में, कहीं इमारत के नाम पर, कहीं गरीबों के नाम पर जमा किया जा रहा है. आज तक सरकार कुछ नहीं कर पाई. सरकार के सरकुलर निकाल कर खामोश बैठ जाने से मसला हल नहीं होगा, बल्कि सख्त कार्रवाई करनी पड़ेगी.
खुफिया तरीके से ऐसे कॉलेजेस पर निगरानी करना होगी, तब जाकर डोनेशन की ये नहूसत और लानत से मुल्क पाक होगा. तालीम का मेयार बुलंद और अच्छा होगा. तभी ये मुल्क भी तरक्की करेगा.. तालीमयाफ्ता काबिल बच्चे अधिकारी बनेंगे तो इंशाअल्लाह बहुत ही जल्द ये मुल्क सुपर पावर और महासत्ता बन कर दुनिया के सामने आयेगा. आज जुमा की नमाज और दुआ में हम खुदा से ये मांगते हैं कि ऐ अल्लाह हमारे बच्चों को खूब इल्म से नवाज़ दे और हमारी गरीबी को, हमारे बच्चों और हमारे मुल्क की तरक्की में रुकावट न बना और डोनेशन की लानत से हमारे मुल्क को पाक फरमा (आमीन).
-जलगांव (महाराष्ट्र) की एक मस्जिद में जुमे (16.6.2012) का खुत्बा